

Save ₹50.00 on this edition
मेरा एक स्पष्ट विश्वास है: काव्य-मर्म तीन प्रकार के होते हैं, कवियों के तीन प्रकार होते हैं, और कविताओं के भी तीन प्रकार होते हैं।
पहला प्रकार तितली है: वह कवि जो एक इल्ली से तितली में रूपांतरित हो जाता है—जिसकी रचनाएँ सौंदर्य, सौंदर्य बोध से जन्मे सामंजस्य और संसार की भव्यता के विस्मय से भरी होती हैं। इस तरह की कविता पढ़ना हमें भी थोड़ा अधिक सुंदर बना देता है। दैनिक जीवन की चिंताओं से दबा हुआ पाठक, तितली जैसी कविता के प्रभाव में एक छोटे-से कायांतरण से गुजरता है—अपने कोह से निकलकर कुछ अधिक हल्का, अधिक कोमल, अधिक दीप्तिमान बनकर उभरता है।
दूसरा प्रकार की कविता पत्थर सरीखी है। जब कवि लिखता है, तो मानो वह एक पत्थर उठाकर समाज रूपी झील में फेंक देता है। पत्थर हलचल पैदा कर देता है: शांत सतह को हिलोर देता है, ऊँची-नीची लहरें और उनमें एक अनुगूँज पैदा करता है। यह हलचल जल में एक आलोड़न ले आती है-उसे शांत सतह से एक उफनते-गहनते रौरव में बदल देती है, भले ही कुछ समय के लिए, इससे पहले कि वह धीरे-धीरे फिर से शांत हो जाए। पत्थर भले ही डूब जाए, लेकिन उसकी अनुगूँज उठती रहती है।
तीसरा प्रकार की कविता नश्तर है। यह कविता उन निर्मम, क्षमाहीना सच्चाइयों का सामना करती है—चाहे वे व्यक्तिगत हों, राजनीतिक हों या सामाजिक। यह अन्याय, क्रूरता, दमन की मशीनरी, अपमानित और निर्धनों, घरेलू हिंसा और अपनी समूची नग्नता में मानवीय पीड़ा की बात करती है। यहाँ पाठक कविता द्वारा सहलाया हुआ नहीं, बल्कि उससे चीर दिया हुआ महसूस करता है—मानो किसी तेज़, चमकते चाकू से या कुरेद दिया गया हो नश्तर से। इस प्रकार की कविता घाव करती है। वह पाठक की अंतरात्मा को चीर देती है, उसकी नैतिक दृष्टि पर जमी मोतियाबिंद की परत को उतार देती है। ये घाव भर सकते हैं, हाँ; लेकिन वे अपने पीछे निशान छोड़ जाते हैं—ऐसे निशान जो बने रहते हैं, जो याद रखते हैं। इस प्रकार की कविताओं से हमारा साक्षात्कार हमारी दृष्टि को अधिक पैना कर देता है, और जब पीड़ा कम भी हो जाती है, तब भी उस चीरे की स्मृति हमारे साथ बनी रहती है—जो हमें हमेशा याद दिलाती रहती है कि किन बातों को हम कभी भुला नहीं सकते।
विश्व कविता के इतिहास में कविता के ये तीनों प्रकार—और कवि भी—मौजूद हैं। चाहे वह तितली हो, पत्थर हो या नश्तर, मेरा मानना है कि हर तरह की कविता का अपना महत्व है, और हर एक का अपना खास समय और जगह है।
ये तीनों हमेशा से एक ही घर में साथ रहते आए हैं। उन्हें आपस में प्रतिस्पर्धा करने की कोई आवश्यकता नहीं है। अच्छे दिनों में वे एक-दूसरे से जिज्ञासा के साथ मिलते हैं: तितली प्रकाश लेकर आती है, पत्थर परिवर्तन लेकर आता है, और नश्तर साफ़गोई लेकर आता है।
मेरी अपनी कविताएँ इन तीनों अवस्थाओं के बीच झिलमिलाती रहती हैं। मैं नहीं चाहता कि वे बिना किसी उलझन के बस सुकून दें, या सिर्फ़ एक बार पानी में पत्थर फेंकने जैसी हलचल पैदा करें, या फिर सर्जरी की तरह सटीकता से अंतरात्मा से मोतियाबिंद की तरह कोई चीज़ हटा दें। जिस दुनिया में हम रहते हैं, वह एक ही समय में तितली, पत्थर और नश्तर—तीनों हो सकती है। अच्छे दिनों में एक कविता में भी वही जटिलता हो सकती है। इसके बाद जो होता है, वह पाठक का होता है: उनके बीते दिनों और ज़ख्मों का, उन दृश्यों का जिनकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता या जिनके बारे में सोचने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाता।
मैं बहुत यात्रा करता हूँ और अलग-अलग तरह के श्रोताओं के सामने अपनी नई रचनाएँ पेश करता हूँ। उसके बाद, हम बातचीत करते हैं। जो बातें उभरकर आती हैं, उनमें हर तरह की समानता और दूरी होती है: जैसे एक अक्षांश से दूसरे अक्षांश तक जाने पर सूर्यास्त का रंग कैसे बदल जाता है; बारिश का क्या मतलब होता है जब वह त्वचा को ठंडक पहुँचाती है, और क्या मतलब होता है जब वह कविता की बस एक पंक्ति बनकर रह जाती है; क्या हमारे पास इतना सब्र है कि हम प्रतीकों को उनके शाब्दिक अर्थ से परे जाकर खुलने दें। दांव पर वे गहरे अंतर्भेद हैं जिन्हें सबसे गहरा प्रेम भी नहीं मिटा सकता, और हमारे भीतर की वह सबसे प्राचीन इच्छा: पार जाने की, एक नया रूप धारण करने की।
इन सब के बावजूद, एक बेहद सरल और अटूट सामग्री हमेशा बनी रहती है: भाषा। किसी की भी भाषा। सरल इसलिए, क्योंकि यह सहज ही हाथ आ जाती है; जटिल इसलिए, क्योंकि वही शब्द अपरिवर्तित रहने से इनकार कर देते हैं। महज़ 'अब भी' (still) या 'फिर भी' (yet) जैसे शब्द पूरे वाक्य को एक तरफ झुका सकते हैं। एक छोटी सी धुरी खट से अपनी जगह बैठती है, और दरवाज़ा एक ऐसे मिलन या टकराव की ओर घूम जाता है जिसे फिर कभी बदला नहीं जा सकता। भाषा एक साधारण माटी की तरह है, फिर भी हर स्पर्श उस पर अपनी एक अनूठी छाप छोड़ जाता है।
जहाँ तक यह प्रश्न है कि मेरी कविताएँ किस श्रेणी में आती हैं—तितली, पत्थर या नश्तर —मैं यह निर्णय पाठक पर छोड़ता हूँ। जब कोई कविता अपने पाठक से मिलती है, तब मैं उसमें केवल आंशिक रूप से उपस्थित होता हूँ। महत्वपूर्ण यह है कि वह उनके भीतर क्या जगाती है, और कैसे। ये तीनों रूप किसी ऊँच-नीच (hierarchy) को नहीं दर्शाते, बल्कि ये एक सतरंगी विस्तार (spectrum) हैं, साथ चलने वाले सहयात्रियों का एक समुदाय। पढ़ने के उस ख़ास दिन, इनमें से कोई एक रूप आगे बढ़ सकता है। कविता महज़ एक द्वार खोलती है; उसमें रोशनी पाठक भरता है।
पाल डेनियल लेवेंटे

पाल डेनियल लेवेंटे
Authorपाल डेनियल लेवेंटे हंगेरियन भाषा के प्रसिद्ध लेखक हैं, जिनकी आठ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और उनकी रचनाओं का 20 से अधिक भाषाओं में अनुवाद हुआ है। उन्होंने कला पत्रिका एवं प्रकाशन गृह 'PRAE' की सह-स्थापना की और इसके उप-मुख्य संपादक के रूप में कार्य किया। वे 'ELTE यूनिवर्सिटी प्रेस' के मुख्य संपादक तथा हंगेरियन पेटोफी सांस्कृतिक एजेंसी व साहित्यिक कोष के प्रबंध निदेशक भी रह चुके हैं। इस दौरान उन्होंने अंग्रेजी साहित्यिक पत्रिका ‘Continental Literary Magazine’ के कार्यकारी निदेशक की जिम्मेदारी संभाली। कला के क्षेत्र में, उन्होंने विभिन्न स्वतंत्र थिएटर और प्रदर्शन कला समूहों के साथ अभिनेता एवं निर्देशक के रूप में एक दशक तक कार्य किया है। वर्तमान में वे 'बुडापेस्ट कैपिटल सर्कस' में नाट्यकार (Dramaturg), शो लेखक और गीतकार (Librettist) हैं, जहाँ उन्होंने बुडापेस्ट अंतर्राष्ट्रीय सर्कस महोत्सव सहित 60 से अधिक प्रस्तुतियों में अपना योगदान दिया है। इसके साथ ही, वे 'गोडोलो सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा' के नाटकीय संगीत कार्यक्रमों में भी नाट्यकार की भूमिका निभा रहे हैं। वे अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक व कविता उत्सवों और शैक्षणिक सम्मेलनों में नियमित रूप से आमंत्रित किए जाते हैं। साहित्य, कला और प्रबंधन के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें हंगरी, ब्राजील, फ्रांस, रोमानिया, सर्बिया, अजरबैजान और संयुक्त राज्य अमेरिका में कई राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।

आशीष दत्ता
Translatorआशीष दत्ता पेशे से एक इंजीनियर होने के साथ-साथ हिंदी और अंग्रेजी के साहित्यकार हैं। आशीष दत्ता की रचनाएँ मानवीय अनुभवों के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक आयामों को गहराई से रेखांकित करती हैं। उनका प्रथम काव्य संग्रह ‘यौवन की दहलीज़ पर’ हाल ही में संपर्क प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ है। उनका द्विभाषी नाटक ‘कपालिका’ (हिंदी एवं अंग्रेजी) तथा प्रथम अंग्रेजी काव्य संग्रह ‘The Bird Flown Away and other poems’ भी शीघ्र ही संपर्क प्रकाशन द्वारा प्रकाशित होने वाले हैं। एक कुशल अनुवादक के रूप में उन्होंने रॉबर्ट वाल्सर, नाज़िम हिक़मत और डेनिश नाटककार एस्ट्रिड सालबैक जैसे विश्वप्रसिद्ध कवियों, नाटककारों और लेखकों की कालजयी रचनाओं का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया है।

Pál Dániel Levente
₹225.00

Jibanananda Das
₹225.00

Puneet Bagrodia
₹1,299.00

Aishani Bhattacharya
₹499.00

आशीष दत्ता
₹299.00
Follow us